Adhik mass ki Katha 22 adhyaya | अधिक मास की कथा 22वा अध्याय
|| अथ द्वाविंशो ऽध्याय: प्रारम्भ: ||
|| श्री गणेशाय नम: ||
हे लक्ष्मी! भगवान नारायण से सूतजी शौनकादि ऋषियों से और भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से कहते हैं। हे लक्ष्मी! पहले किसी समय मारवाड़ प्रदेश में गोकर्ण पर्वत के किनारे शिवपुरी नाम की एक सुंदर नगरी थी। वह नगरी चारों तरफ विख्यात और प्रसिद्ध थी। उसमें बड़े बड़े राजमार्ग और छोटे बड़े गलियाँ, गलियारे बने हुए थे। बड़े बड़े महल और छोटे बड़े मकान बहुत से थे। उस नगरी में चारों वेदों के ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण और क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी वर्ण और जाति के लोग रहते थे। और अपने अपने कर्म करते हुए सब संपन्न और सुखी थे। सत्य बोलना, शुद्ध सात्विक व्यवहार करना यही समस्त नगरवासियों में विशेषता थी।
अनेक स्थानों पर कथा, भागवत, होम, हवन, यज्ञ आदि हमेशा होते रहते थे। वेद मंत्रों का घोष और शास्त्रों की चर्चा हर मंदिरों में हुआ करती थी। सभी जाति के लोग एकत्रित होकर भजन, कीर्तन आदि किया करते थे। उस नगरी में अधर्म और पाप कहीं देखने में नहीं आता था। ऐसी वह उत्तम शिवपुरी नाम की नगरी थी। उसी नगर में विप्रदास नाम का एक शूद्र रहता था। वह सदाचार संपन्न और जैसा उसका नाम था उसमें गुण भी था। उसी प्रकार उसकी स्त्री भी अत्यंत सुंदर पतिव्रता, पति की आज्ञा का अनुसरण करने वाली थी। वे दोनों पति-पत्नी हमेशा ब्राह्मणों की सेवा में लगे रहते थे। जब पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब दोनों पति-पत्नी ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर नित्य ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का नियम प्रारंभ करके ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का दान करने लगे।
हे लक्ष्मी! गोकर्ण पर्वत के समीप गोकर्णो नाम की नदी थी। उसी नदी के किनारे सारणेश्वर नाम का भगवान शंकर का भव्य मंदिर था। उस मंदिर में लिंगरूप भगवान शंकर की सुंदर और जागृत मूर्ति है। भगवान सारणेश्वर की पूजा अर्चना से मनुष्यों की समस्त मनोकामनाएं परिपूर्ण होती है। वह विप्रदास पति के सहित नित्य प्रति उसी गोकर्णो नदी में ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने के लिए जाता था। और स्नान करके भगवान सारणेश्वर की पूजा करते और विद्वान ब्राह्मणों की पूजा करके श्रद्धापूर्वक अन्न, वस्त्र, तिलपात्र, सुवर्ण, द्रव्य का दान करते थे।
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इस प्रकार संपूर्ण अधिकमास पर्यंत उनका क्रम चलता रहा अंतिम अमावस के दिन उसी मंदिर में अनेक विद्वान ब्राह्मणों को निमंत्रित करके यथानियम पूर्वक अध्यापन किया और स्वर्णिक ब्राह्मणों को उत्तम भोज्य सामग्रियों से भोजन कराकर वस्त्र अलंकार और सुवर्ण आदि की दक्षिणा दी। और हाथ जोड़कर ब्राह्मणों से दीनवाणी के द्वारा प्रार्थना कि हे महाराज! मैं अत्यंत दीन और गरीब हूं, आप लोगों ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की जो मेरा निमंत्रण स्वीकार करके अपने यहां आए। आप लोग मुझे आशीर्वाद दें कि मेरा यह उद्यापन संपन्न हो गया और मेरे मन में भगवान के प्रति और आप लोगों के चरणों में ऐसी ही श्रद्धा बनी रहे।
इस प्रकार ब्राह्मण लोग उस विप्रदास को आशीर्वाद देकर अपने अपने घर चले गए। विप्रदास अपना समस्त कार्य जैसे मंदिर जाते हुए दान, भोजन सायंकाल होकर रात्रि का समय आ गया। तब वह पति के सहित साथ भगवान का प्रसाद चरणामृत और गोकर्णो गंगा जल लेकर अपने घर जाने के लिए निकला। आद्यात्म ही पर सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले अपने घर के जाने के लिए सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए, वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले थे। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। (पाठ में यहाँ पुनरावृत्ति है) वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले थे। भयंकर आकृति वाले सैकड़ों प्रेत खड़े हुए दिखाई दिए। वे सब भयानक शरीर अनेक प्रकार के मुख वाले भयंकर आकृति वाले थे। निरंतर चीत्कार का शब्द और अंगों से समस्त चमकती हुई और मेंढक का मुख, शरीर और जैसा उसका नाम था उसी प्रकार का उसमें गुण था। उसी प्रकार उसकी स्त्री भी अत्यंत सुंदर पतिव्रता, पति की आज्ञा का अनुसरण करने वाली थी। वे दोनों पति-पत्नी हमेशा ब्राह्मणों की सेवा में लगे रहते थे। जब पुरुषोत्तम मास प्रारंभ हुआ तब दोनों पति-पत्नी ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर नित्य ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने का नियम प्रारंभ करके ब्राह्मणों को अनेक प्रकार का दान करने लगे।
हे महाराज हम लोग प्रेत हैं निंदनीय वस्तु का भक्षण, हिंसा आदि निंदनीय हमारे कर्म है अनेक
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पाप कर्म करना दूसरे लोगों को कष्ट देना यही हमारा कर्म है। हम लोग अत्यंत क्रूर स्वभाव के हैं। हमारी संख्या सात सौ है। भूख प्यास से पीड़ित होकर घूमते रहते हैं। इस प्रेत योनि में सिवाय दुःख के कुछ भी नहीं है। आज आपके चरणों को देखकर मन को कुछ समाधान हुआ है। हे महाराज साधुजन के रक्षक होते हैं। हम लोग अत्यंत पापी और दीन है। आपके सिवाय हमारा कोई उद्धार नहीं कर सकता आप महान पुण्यात्मा है हम लोग दुःख भोगते हुए मारे-मारे फिरते हुए, अनेक कल्प बीत गए। आज हमारे सौभाग्य से आपका दर्शन हो गया। आप से प्रार्थना है अपने पुण्य प्रभाव से हम लोगों को इस प्रेत योनि से मुक्ति दे दो।
इस प्रकार प्रेतराज की प्रार्थना को सुनकर विप्रदास के मन में दया उत्पन्न हो गई। उसने मन में भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान करके हाथ में गोकर्णो गंगा का जल लेकर संकल्प किया कि मैंने इस अधिकमास में जो नित्य स्नान का नियम धारण किया उसमें से सात स्नान का पुण्य होते ही वे सब प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य स्वरूप धारण कर, स्वर्ग लोक को चले गए। हे लक्ष्मी सात सौ प्रेतों का उद्धार सिर्फ सात स्नान के पुण्य से हो गया। हे लक्ष्मी सौराष्ट्र देश में प्रभास नाम की एक नगरी थी उसमें सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह वेद शास्त्रों में पारंगत सर्वगुण संपन्न वाजपेय आदि यज्ञों को करता था। अपनी शक्ति के अनुसार दान पुण्य भी करता था। उसने परोपकार की दृष्टि से अनेक गांवों में कुआं बावली भी बनवा दिए थे। समय समय पर कार्तिक स्नान माघ स्नान व्रत, उपवास अनेक पर्वों के पुण्य प्राप्ति के दान भी किए थे।
एक समय वह सोमशर्मा ब्राह्मण किसी पर्व के समय सरस्वती नदी का सागर के साथ जहां संगम हुआ वहां स्नान के निमित्त घर से निकला। जंगल के मार्ग से जा रहा था। रास्ते में एक पर्वतकार शरीर वाला भयंकर राक्षस मार्ग में खड़ा हुआ था। वह पीले रंग का जा रहा था रास्ते में एक पर्वतकार शरीर में स्थित लगा हुआ लंबा, लंबी गर्दन, लंबा पेट, मुख विकराल जिह्वा, बड़ी बड़ी मगरमच्छ जैसी दाढ़े, गुफा जैसी नाक, ऊंट के समान खड़ा हुआ उस राक्षस को देखकर मन में कुछ भयभीत हुआ। परंतु हिम्मत करके मन में नृसिंह भगवान का स्मरण करके खड़ा हो गया। वह राक्षस ब्राह्मण को देखकर उसको पकड़ने के लिए दौड़ा। ब्राह्मण के समीप जाने पर भी वह ब्राह्मण को स्पर्श करने में असमर्थ हो गया।
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पुण्य कर्मों के द्वारा ब्राह्मण तेज और आत्मबल होने से राक्षस असमर्थ हो गया। उसका कोई बल प्रयोग नहीं चलता था। अपनी ऐसी अवस्था देख राक्षस को आश्चर्य हुआ और मन में ज्ञान का उदय हुआ कि यह ब्राह्मण जरूर कोई पुण्यात्मा और तपस्वी होना चाहिए। मैंने तो बड़े-बड़े शक्तिशाली नर और पशुओं को मार डाला। फिर ये साधारण मनुष्य के सामने मेरी शक्ति क्यों क्षीण हो गई। ज्ञान उत्पन्न होते ही वह राक्षस सोमशर्मा को दंडवत नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करता है, हे स्वामी! पुण्यात्मा आज मैं आपके पुण्य तप के समक्ष असमर्थ हो गया हूं। मैं राक्षस हूं अनेक स्वरूप का दर्शन करने से मेरे पाप नष्ट हो गए हैं और ज्ञान का उदय हो गया है। मैं आपके दर्शन करने के लिए तरस रहा था। मेरे भाग्य से आपके दर्शन हो गए हैं और आपके दर्शन करने से मेरा पाप नष्ट हो गया है। मैं आपके दर्शन करने से मेरा पाप नष्ट हो गया है। हे स्वामी! मेरे ऊपर भी कृपा करके मुझे इस दुर्गति से मेरा उद्धार करिए। साधुजन हमेशा दोनों के रक्षक और परोपकारी होते हैं। मेरे ऊपर भी आप उपकार करिए।
इस प्रकार राक्षस की प्रार्थना सुनकर ब्राह्मण ने मन में विचार किया कि अगर मैंने इसके ऊपर दया नहीं की तो यह राक्षस और अनेक प्राणियों को कष्ट देकर हत्या करेगा। इस का उद्धार करने से मुझे भी पुण्य प्राप्त होगा। ऐसा विचार कर ब्राह्मण ने हाथ में जल लेकर भगवान पुरुषोत्तम का स्मरण करके संकल्प किया कि मैंने अधिक मास में जो स्नान किए हैं उसमें से एक स्नान का पुण्य इस राक्षस को प्राप्त हो, ऐसा कहकर जल राक्षस के ऊपर छोड़ दिया। जल पड़ते ही वह राक्षस दिव्य स्वरूप होकर ब्राह्मण की वंदना करता हुआ स्वर्ग लोक को चला गया। हे लक्ष्मी महान पुण्य दायक पुरुषोत्तम मास में स्नान करने की महिमा है।
|| जै जै श्री अधिकमास महात्म्य सार ||
|| बृहत् नारदीय पद्याधारे द्वाविंशो ऽध्याय: समाप्त: ||
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